Saturday, February 27, 2010

मदहोश करती ये रात

ये खामोशी, ये सन्नाटा, मदहोश करती ये रात,
मन में मेरे पैदा करती कुछ अनोखे जज़्बात|
केहती मुझको तुम रुक जाओ, मदहोश करती ये  रात,
जैसे करना चाहे मुझसे प्यार भरी कोई बात|


शोर शराबा, धुआं, प्रदुषण, यहाँ नहीं कुछ पास,
यहाँ तो केवल गूँज रही है लहरों की आवाज़|
ऐसे सन्नाटे की मन को कब से थी तलाश,
यहाँ आकर लगता है जैसे बुझ गई सदियों की प्यास|


चमकते चाँद सितारे पूछे, क्यूँ लगता है डर?
रेट के इस सुनहरे आँचल में  रख दे अपना सर,
भूल जा अपने सारे ग़म, रह जा तू हमारे पास,
भर देंगे तेरी झोली में आज अति उल्लास|

जाना चाहते हो तो जाओ करके हमे निराश,
यकीन है हमको, तुम लौटोगे करते हमको तलाश,
तब शायद नहीं रहेंगे ऐसे मधुर हालात,
तब शायद नहीं रहेगी मदहोश करती ये रात| 

2 comments:

  1. Man, you are rocking !! A good one. - Vijay

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  2. Hey Vijay.. Thanks a lot.. Was at the beach.. So it inspired me to write this poem.. :D

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